वह दिन याद है मुझे जब हम क्रिकेट के नए सरताज थे, मैं २ दिन हर आम आदमी जो खुद को क्रिकेट में उस्ताद समझता है उनकी राय और मीडिया की भाषा में कहाँ जाये तो एक्सपर्ट कमेन्ट सुन रहा था...वर्ल्ड कप की इसी चकाचौन्द में नाशिक में अन्ना हजारे की एक परिषद् हुई और उन्होंने कहाँ था की में जंतर मंतर पर अनशन कर रह हूँ, लेकिन अनशन के बाद क्या होगा उसका सही सही या पक्का जवाब उनके पास नहीं था.... अपने आप को राष्ट्रिय कहने वाले न्यूज़ चैनल वालोने ने कौन है अन्ना हजारे कहकर खबर को मार डाला.... क्यूंकि में मीडिया से हूँ तो उस जगह में अन्ना जी से मिला था... वहां मुझे एक निवृत्त कर्नल मिले जो मुझे इस आन्दोलन पे काफी बाते बता रहे थे. वह पहली बार अन्ना को सुन रहे थे... और काफी अभ्यासू भी लग रहे थे... ... मुझे उनका रवैया एक आम आदमी का दृष्टिकोण लगा....फिर में उनसे हमेशा कुछ अंतराल के बात बातें करते रहा.... वही सब उनकी सोच से...........'
कुछ कार्यकर्ता हमें मेसेज और इन्टरनेट पे क्या किया जा सकता इसपर बता रहे थे... मुझे यह एक अपने आप में अनोखी बात लगी की यह युवक अन्ना जी से कैसे जुड़े.. जैसी भीड़ वर्ल्ड कप के जीतने के बाद रस्ते पे दिखी वैसी तो नहीं थी.. लेकिन मैंने नजरंदाज किया ... नहीं करना पड़ा....क्यूंकि Right Information के लिए २ साल बड़े बड़े पापड़ बेलने पड़े रहे वही अन्ना जी को खुद दण्डित भी होना पड़ा था. और अब अन्ना लोकपाल की बात कह रहे जो बड़ा मुद्दा था, और दूसरी और कर्णाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े का हाल भी मीडिया के जरिये देख रहा था... वही दूसरो राज्य में लोकायुक्त है या नहीं यह पता नहीं है.... तो अन्ना जीने कोई जनाधार नहीं, न बड़े कार्यकर्ता या फिर आन्दोलन के लिए राशि... यह सब आम आदमी के नजरिये से देख रहा था....
लेकिन अनशन हुआ मुझे अलग अलग नाम पता चले... मैंने अन्ना जी के यहांसे १५ रु देके लोकपाल विधायक की किताब खरेदी और पढ़ी... अन्ना जी की मांग जायज लगी... और जिस तरह मीडिया ने इसको उछाला तो अन्ना जी को समर्थन भी मिला लेकिन मीडिया ने यह बात अपने हिसाब से पेश की थी, जंतर मंतर से २४ घंटे लाइव हुआ... एक अजीब बात भी देखि थी की अन्ना और साथी अनशन पे है और वह्हन चाट के स्टाल वालोंकी काफी चांदी थी.... मुझे तो शक है की कितने पत्रकारों ने खुद बिल के सरकारी और पब्लिक दोनों मसौदे पढ़े थे ... और लगा की १५ रु काम आये... और फिर आन्दोलन सफल रहा ...लेकिन मुझे लगा की अभी खरा खरा खेल चालु होगा... जो लोग अन्ना के साथ थे वह खुद अन्ना के लिए भी नए थे... और जो हुआ वह बहुत जल्दी में शायद अन्ना को भी अंदाजा न हो.... और टीम गठित करनी पड़ी.. और टीम जो सामने आई वह आम आदमी के हिसाब उनके क्षेत्र से एक्सपर्ट लग रहे थे, चलो अच्छी टीम बनी...
लेकिन बादम में आरोप प्रत्यारोप चलने लगे, बीजेपी शिवसेना ने अपने रंग बदले, राष्ट्रवादी और कांग्रेस ने अपने असली रंग दिखना सुरु किया... तो जो मैंने देखा वह इस तरह... जो आरोप कर रहे थे उनकी पहचान उनके राजकीय पक्ष के वजह से थी न की उनकी खुद की... जो आरोप झेल रहे हैं उनकी खुद की पहचान थी... बाकि राजकीय पक्ष की बात को मैंने तबज्जुब नहीं दिया... शिवसेना और राष्ट्रवादी के कुछ मंत्री आन्ना जी ने घर भेजे है... इसलिए मेरा ध्यान उनकी तरफ था... जब भूषण जी के कथित सीडी का विवाद उठा तो ऐसा लगा ता है...
जिस तरह अन्ना हजारे और उनके सथियोंपर सभी राजनैतिक दल आरोप कर रहे है, उससे यही लगता है की वह अन्दर से डर गए है, अब रही बात किसका दमन कितना साफ़ है, तोह सभी राजनैतिक दलो के मुखिया इसका जवाब दे की अगर वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है और हीरो बनाना नहीं चाहते, जो अपने निष्ठां पर शक नहीं चाहते, जिनको लोकपाल बिल में शक नजर आता हो... ऐसे सभी मुखिया उत्तर दे की आप पिचले ६० साल से सत्ता में हो या फिर विरोधक हो...कहीं न कहीं आप देश को चला रहे हो और लोगो का प्रतिनिधित्व कर रहे हो.. फिर भी.....
१) यह बिल इससे पहले पास क्यूँ नहीं हुआ..
२) देश में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार क्यूँ बढ़ा
३) क्यूँ घोटाले पे घोटाले सामने आ रहा है और इसमें राजकीय सम्बन्ध जरुर होते है..
४) हर पोलिटिकल पार्टी को कितना चंदा आता है और कौन देता है.... इसपे टैक्स क्यूँ नहीं है ?
इसके आगे और सवाल बचाता है की आपको खून का आरोप झेल रहे मुख्यमंत्री चलते है, बाहुबली संसद चलते है क्यूंकि आपको सरकार बचानी है... खेल के पीछे करोडो का भ्रष्टाचार करनेवाले चलते है, शहीद जवानो के घर के साथ उनके अंतिम संस्कार के ताबूत में पैसे खाने वाले चलते है.... और देश को अमीर लोगो के हाथ में बेच ने के बाद उन्ही लोगो का समर्थन करते हुए आप यह कहते हो की यह हमारी गठबंधन सरकार की मज़बूरी है....... एक भी पार्टी दिखाए की उसके पक्ष का कोई भी बड़ा नेता महीने को सिर्फ ३ या 4 आंकड़ो में कमाता है, सार्वजनिक वाहतुक व्यबस्था का हर दिन उपयोग करता है, जिसके नजदीकी सरकारी नौकरी में या बड़े INDUSTRIALIST या फिर राजनीति में नहीं है.... जिसकी खेती या रियल एस्टेट में इन्वेस्टमेंट ना हो , जिसको विरासत में गद्दी या चवन्नी भी नसीब ना हो ......ऐसा आम आदमी दिखाओ जो बड़े पद पे बैठा हो राजनैतिक पार्टी में.तो इसके आगे अन्ना जी के साथी काफी सरल और साफ़ सीधे है हम यह नहीं कहेंगे वह निर्दोष है.. लेकिन इरादा नेक लगता है.. इससे तुरंर कोई बदलाव भी नहीं आएगा... जैसे जन्तार्मंतर का अनशन ख़तम हुआ वैसे ही चायपानी का खेल और बढा....
अगर राजनेता सही है तो क्यूँ ऐसे आरोप करते है... हो जाने दे बिल पास ....फिर समझेगा कोण कितना पानी में है....
मीडिया रवैय्या भी अचरज डालने वाला था की किस खबर को कितना महत्व दे....
यह उनकी सोच थी... और मेरे पास उनका समाधान करे ऐसा जवाब नहीं था.